जागेश्वर धाम

हिमालय पर्वत श्रृंखाओं के गोद में विशाल देवदारू वृक्षों के घने जंगलों के बीच में बसे है भगवान शिव। वैसे तो हिमालय में बहुत सारे शिव मंदिर बने है लेकिन जो जागेश्वर में शिव है वो बहुत ही प्राचीन है। वेदों पुरणों में जो कि अटल सत्य है उनमें श्री जागेश्वर शिव का नाम आता है। ये एकमात्र स्थान है जहां शिव अपने जागृत अवस्था में रहते है, जो मांगो वो मिल जाता है। पूरे सृष्टि में एक मात्र स्थान श्री जागेश्वर महादेव इनका इतिहास आप केदार खण्ड, शिव पुराण आदि में देख सकते है। याेगी, जोगी, नागाबाबा,साधु व संत की इस पावन भूमि में सदा जलने वाला अखाड़ा और वही पर समसान जहा पर श्री भगवान लकुलीस और शिव ने एक साथ तपस्या कि। इसलिए जहा भी शिव भूमी होती है वहां पे समशान अवश्य होता है। इसीलिए भगवान शिव को श्मशानवासी भी कहा जाता है। यहीं पर अत्यंत सुंदर और अद्भुत भगवान लकुलीस जी के भी दर्शन होते हैं। 

Jageshwar dham ke mandir~

मंदिर से ३km पहले शिवपार्वती देवदार वृक्ष 
आरतोला से जब हम जागेश्वर के लिए जाते है तो गेट पे ही आपको शिव पार्वती  देवदार वृक्ष के रूप मैं दशन होते है। 

मोक्ष धाम आश्रम ~
वहाँ से ०.५km ड्राइव करने के बाद मोक्ष धाम आश्रम आता है, जहाँ पे आपको महाराज जी
श्री प्रकाशानंद महाराज टीट बाबा उनके समाधि स्थल और १२ज्योतिर्लिंग के दर्शन होंगे। ये आश्रम भी दो छोटी सी जल धाराओं के बीच मैं बना है। 
 

Moksh Dham


दंडेश्वर महादेव/ धूनी/ चण्डिका देवी/ कुबेर मंदिर ~
यहाँ पे क़रीब १५se २० मंदिरों का समूह है। सबसे पुराना और सबसे ऊँचा शिव मंदिर ७th शताब्दी मैं बना शिव लिंग उत्पत्ति का एक मात्र स्थान। और २४ घंटे धूनी जलती रहती है। 
 

Dandeshwar and Kuber Mandir


ऋणमोक्ष स्थान ~
ऋषियों द्वारा निर्मित एक दुर्लब मंदिर यहाँ पे दो धाराओं का संगम है, यहाँ पे लोग मान्यता के अनुसार मनुष्य जीवन मैं किए गए ऋणों से मुक्ति के लिए खीर का भोग लगाते है, ताकि जन्म मृत्यु के बंधन से मुक्ति हो पाए, 
 

RinMoksha


पंच पांडव देवदार वृक्ष ~
ऋण्णमोक्ष स्थान मैं ही है एक विशाल देवदार का पंचपांडव वृक्ष जो अपनी अनूठी छवि से लोगों को देखने पे मजबूर कर देता है। 

विनायक क्षेत्र ~
यहाँ पे दर्शन होते है जटा गंगा नदी के, जटा गंगा का मूल स्थान यहाँ से २km ऊपर ट्रेक करके वहाँ पे उनका उद्गम स्थान है। यह एक अद्भुत दृश्य है एक विशाल पेड़ चट्टान पे है और उस पेड़ की जड़े चट्टान से नीचे लटकी रहती है जैसे लगता है की शिव जटा है और पानी की बूँद वही से टिप टिप करके गिरती है जो जागेश्वर जगन्नाथ मंदिर की परिक्रमा करके आगे सरयू नदी मैं मिल जाती है। यहाँ पे जटा गंगा सरयू से मिलती है, उस संगम को और वहाँ पे सरयू जटेश्वर कहलाती है। 


श्री जागेश्वर मंदिर समूह ~
पुरे जागेश्वर गांव में देखा जाए तो यहा २०० से ज्यादा मंदिर है। लेकिन केवल जागेश्वर मंदिर समूह में १२४ मंदिरों का ग्रुप है। जिसमें ५ मुख्य मंदिर Jagnath नागेश, हनुमानजी, पुस्टि माता, महामृत्युंज, केदार, और मंदिर के प्रवेश द्वार पे बटुक भैरव तथा बाहर जाके सबसे अलग थलग भगवान कुबेर की का मंदिर है| जिनमे से प्रमुख है। 
 

ज्योतिर्लिंग जागेश्वर~
जागेश्वर ज्योतिर्लिंग महादेव जो की स्वयंभू देव है। आदिगुरु शंकराचार्य जी ने इन्हीं मंदिरों का पूजा पाठ सुचारू करवाया। अलग-अलग स्थानों से पंडितों को लाकर यहां पूजा-पाठ शुरू करवाई। दिव्य ज्योतिलिंग  अस्टम ज्योर्तिंलिंग नागेशम नाम से प्रशिद है। दारुका वने भगवान शिव देवदार के विशाल पेड़ों के बीच में बसे है। जहाँ पर जटागंगा नामक नदी बहती है। ऋषि जन, योगी जन अपनी साधना के लिए यहां तपस्या में मग्न रहते हैं। एक अलौकिक दिव्य प्रकाश के लिए सालों साल सर्दी हो चाहे गर्मी यह साधना में जमे रहते हैं। उनका जोगी भैश में आना ज़रूरी नहीं। योगी किसी भी भैस में आ सकते है। यहां सुबह सूर्योदय से पहले प्रातः पूजा, दोपहर में भोग पूजा, और सायं को बहुत ही सुन्दर आरती देख मन को अति शांति मिल जाती है। इस स्थान पे २ पल बैठकर ध्यान लगाना मतलब वर्षों तप किया, ऐसा फल मिलता है। 

महामृतुंजय ~
आदियोगी जगत गुरु शंकराचार्य जी ने अपनी दूर दृष्टि से कलयुग के घोर विनाश को देखकर अपने तपो बल से मृतुन्जय भगवान माने मृत्यु पर विजय पाना यहां पे अदभुत शक्ति पूंज को मंत्रो द्वारा किल्लीत यानी शक्ति को कम कर दिया और केवल भाव प्रधान मनुष्य को ही उस आलौकिक शक्ति का एहसास करने वाला बना दिया। विशाल शिवलिंग के सामने बैठने मात्र से ही हमें उस शक्ति का या फिर तुरंत समाधि में लीन हो जाते है। यहां पे लोगो द्वारा तरह तरह के पूजा पाठ और संतान प्राप्ति ke liye पुरे रात भर हाथो में दीया लेके आराधना करते है। निसंदेह अगले साल पुत्र को साथ लेकर अवश्य आएंगे। भगवान के आशीर्वाद के लिए। 
पूरे विश्व में केवल एक ही महामृत्युंजय मंदिर है जो कि जागेश्वर में स्वयंभू है। यहां भी तीनी समय प्रातः पूजा , भोग पूजा तथा सायं कालीन आरती अति मनोरमी होती है। शंक, घंटो, मजिरो और डमरू की आवाज से पूरा क्षेत्र गूंज उठता है। जो आपके हृदय को उस ओमकार बिंदु स्वरूप ॐॐ के साथ मिला देता है। हमारा शरीर अपने आप धरती से ऊपर उठ जाता है। लगता है कि हम शरीर नहीं, केवल एक ऊर्जा हैं, हवा की तरह तैर रहे हैं। 
जै सच्चिदानन्दा.
 

Mahamritunjaya Mandir


हनुमान जी~
दक्षिण मुखी हनुमान मंदिर बाबा नीब करौरी महाराज जी के द्वारा एस्थापित मुख्य जागनाथ मंदिर से परिक्रमा मार्ग पे है। भक्तों द्वारा यहाँ पे हनुमान चालीसा और सुंदरकांड का पाठ नित्य रूप से किया जाता है। 

बालेश्वर~
शिव स्वरूप बालेश्वर महादेव हनुमान जी के ठीक सामने है। गर्भ ग्रह मैं शिव स्वरूप लिंग रूपी शिव विराजे है। 

नीलकंठ ~
अत्यंत आकर्षित करने वाले नीलकंठ भगवान अपने छोटे आकर के शिवलिंग अति सुंदर रूप मैं विराजे है। परिक्रमा मार्ग मैं बालेश्वर मंदिर के बाद स्थापित है। 

Neelkanth Mahadev



सूर्य मंदिर ~
सूर्य मंदिर कुछ अवशेष मूर्ति रूप के गर्भ गृह मैं बच्चे है। यहाँ पे जो मूर्ति सूर्य भगवान की थी वो अभी म्यूजियम मैं रखी है। 
 

Surya Mandir


नवग्रह मंदिर ~
सूर्य देव के बगल मैं ही स्थापित है नवग्रह मंदिर। भक्त जान, यहाँ पे शनि देव की पूजा और नवग्रह पूजा का विशेष प्रावधान है। 

Navagraha Mandir


शक्तिपीठ महिषासुरमर्दिनी पुष्टि माता ~
माता पुष्टि देवी अपने सिंह पे सवार हमारे बुद्धि विवेक के अज्ञान का नाश करने वाली महिषा सुर मर्दिनी अपने त्रिकोण वासिनी माँ पश्चिम मैं विराजे है। जो कि महामृत्युंजय भगवान के ठीक पीछे स्थापित है। यहाँ स्थान अति पवित्र और पावन है। यहाँ पे माँ के लिए भोग भी अलग से बनता है। माता जी की प्रातः पूजा भी विशेष होती है कुछ ३ या ४ लोग ही पूजा करना जानते है। 

देवी भोग शाला ~
देवी माँ के लिए भोग रोज़ दोपहर मैं बनता है। यहाँ पे रोज़ पुष्टि माता, नवग्रह, नीलकंठ, हनुमान जी के लिए भोग बनता है। 

यज्ञ कुण्ड ~
पुराणों के अनुसार यहाँ पे सप्तऋषियों के द्वारा यज्ञ किया जाता था हज़ारों सालों तक यज्ञ करने से यह भूमि बहुत जागृत हो गई इसलिए ईश जगह को यगेश्वर या योगेश्वर और अंत मैं जागेश्वर कहने लगे। अभी भी यहाँ पे बहुत अनुष्ठान यज्ञ होते रहते है। 
 

वरुण देव शिव लिंग ~ 
इंद्रदेव की सभा के वरुणदेव यहाँ पे साक्षात शिव लिंग रूप मैं विराजे है। जो खुले आसमान के नीचे स्थापित है। माना जाता है की कभी भी सूखा पड़ने या फिर बारिश ना होने के वक्त यहाँ पे पुजारी जन जटागंगा से १०८ गगरी पानी से इनका अभिषेक करते है और बारिश का आगमन यह है। 

शिवपार्वती भोग शाला ~ 
जिस तरह से इंसान के अपने तोर तरीके होते है। उसी प्रकार से मानव भगवान को भी खाने के लिए भोजन परोसते हैं। वैसे तो भगवान भाव के भूखे होते हैं, लेकिन कलयुग में कर्म को ही प्रधान माना गया है। दिन मैं रोज़ यहाँ पे शिव शक्ति के लिए भोग बनाया जाता है। भोग बनाने वाले पुजारी भी अलग होते है। और शिव प्रसाद को ग्रहण करने के लिए शिव गण भी होते हैं। जिनको हम लोग गोस्वामी कहते है। इनका पूरा विलेज है यहाँ पर। जो प्रसाद ग्रहण करते हैं या फिर अपने घर ले जाते हैं। और बर्तन, चूल्हा और भोगशाला की सफ़ाई करते हैं। 

लकुलीश ~
माना जाता है कि शिव के अंतिम स्वरूप लकुलीश रहे। और हर मंदिर के लालटभिंब या शुखनाशिका पर  अगर लकुलीश इनका प्रतिबिंबित है तो ये शिव मंदिर है। लकुलीश भगवान जी की सुंदर सी मूर्ति म्यूजियम मैं रखी है जो २०१९ मैं अमेरिका से वापस जगेश्वर लाई है। बहुत साल पहले जो यहाँ से ही चोरी हो गई थी।

तांडेश्वर ~
लकुलीश मंदिर के सामने ही टंडेश्वर जी का मंदिर है। इनके दरवाज़े की चौखट पर बहुत सुंदर नागकन्याएँ बनाई गई हैं। जिससे ये भी सिद्ध होता है कि नाग वंश के लोगों ने भी यहाँ पे शिव जी की तपस्या की थी।
 

ऋद्धि पूरी गोसाईं / रेत पुरी महाराज/ समाधि स्थल ~
यह स्थान ज्योतिर्लिंग के जलहरि के मार्ग मैं लकुलीश मंदिर के पास बना है। प्राचीन रूप से इसको समाधि स्थल के नाम से जानते है। पुराने लोगों के कथानुसार इस जगह पे एक योगी रेतपुरी महाराज/ ऋद्धि पुरी गोसाई के नाम से प्रसिद्ध है।जिन्होंने यहाँ पे जीते जी समाधि ली और साक्षात हरिद्वार में प्रकट हो गए। आंध्रप्रदेश बहुत सारे लोग इस स्थान को उनके गुरु स्वामी शिवा नंद मूर्ति महाराज की का भी स्थल मानते है। वो ये कहते हैं कि यह उनका घर है। और उनके गुरु मैत्रीया महाराज जी का भी समाधि स्थल। 
इस तरह से और भी कुछ कहानियाँ प्रचलित हैं। 
 

विशाल अद्भुत अर्धनारीश्वर भगवान शिव पार्वती देवदार वृक्ष ~
देवदार के विशाल वृक्ष जैसे ही आप जागेश्वर की परिधि के अंदर आते है तो आप के चारों तरफ़ देवदार के पेड़ देखने को मिलते है। ये कोई सामान्य पेड़ नहीं बल्कि स्वयं भगवान के प्रतिबिंब है। इसीलिए आगे हूँ देवदार के जंगलों मैं जाएँगे तो हमको तरह तरह जी आकृतियाँ दिखाने को मिलेंगी। जो स्वयं को सिद्ध करती है। 

केदार नाथ मंदिर ~ 
कहा जाता है की आप अगर जागेश्वर आ गए तो समझो आपने सारे पवित्र धामों की यात्रा कर ली। विशाल शिव पढ़वाती पेड़ के सामने ही स्थापित है केदार नाथ भगवान। खास बात यहाँ है की ठीक इन्ही के पीछे से शमशान घर है भी है। और केदार नाथ मंदिर का मुख भी दक्षिण दिशा की तरफ़ है। यहाँ पे पुजारी का एक कार्य यहाँ भी होता है की वह घाट के लिए शिव भिभूति भी दे। 


अन्नपूर्णा देवी मंदिर ~ 
केदारनाथ जी के सामने ही स्थापित है देवी अन्नपूर्णा माँ। 

स्वयं भगवान गणेश जी हांथी के मुख के दर्शन देवदार वृक्ष मैं ~ 
शिवमय दुनिया में गणेश जी कैसे पीछे रह रहे हैं? वह स्वयं देवदार के विशाल पेड़ की शाखा में अपनी स्वयं की आकृति को प्रणाम देते हैं। ये सभी शिव जी आराधना मैं लगातार लगे रहते है। 

नवदुर्गा मंदिर ~ 
आयताकार मंदिरों और विशेष रूप से छत का एक अर्ध गोल आकृति का बना होने के कारण ये दर्शाते है की देवी का मंदिर है। यहाँ की देवी नवदुर्गा की मूर्ति अभी यहाँ पे नहीं है। जो चोरी हो गई थी। कोई बता रहा है कि वो अमेरिका के म्यूजियम में है। 
 

Navadurga Mandir



विशाल यज्ञ कुंड लेकिन अभी कमल कुंड ~ 
कहानियों के अनुसार यहाँ पे एक विशाल यज्ञ कुंड भी है जो अभी कमल कुंड है। सावन के पहिने मैं इसमें कमल खिलते हैं। 
इन्हें साइंस के हिसाब से देखे तो ये मंदिर वाटर टैंक का काम करते है। जब पानी की कमी होगी तो यहाँ से इस्तेमाल किया जा सकेगा।

Kamal Kund or water tank

 

जटा गंगा दर्शन ~
२.५ किलोमीटर ट्रेक करके जटगंगा का पवित्र उद्गम स्थल है। इस स्थान पे एक चट्टान पे विशाल पेड़ की जड़े इस प्रकार लटकी हुई है की यो शिव जटा जैसी लगी है और पानी उन्ही जड़ों से टपकता  रहता है। इसीलिए इसे जटागंगा कहते हैं। 

Jata Ganga


द्वारपालक ज्योतिर्लिंग मंदिर के चौखट पे ~ 
नन्दी और स्कंडी भगवान के पहरेदार २४ घंटे यहाँ पे पहरा देते हैं। अक्सर द्वारपालों का रूप बड़ा और भयानक होता है। क्युकी आप एक पवित्र गर्भ गृह मैं प्रवेश कर रहे है तो इसलिए आपको चाहिए की आप सम्पूर्ण दुनिया को छोड़कर अंदर स्वच्छ मन से प्रवेश करें। अक्सर ये भी देखा गया है की आपको अंदर गर्भ गृह मैं जाने के लिए पाताल लोग से होकर जाना होता है इसलिए जैसे जी आप मंदिर मैं प्रवेश करते है आप एक स्टेप नीचे उतरते है और प्रवेश द्वार पे भयानक नागों की पहरे भी होते है। भगवान किंपूजा से पहले द्वारपालकों की पूजा की जाती है। 

मंदिर के अंदर अष्टकमल के दर्शन~ 
मंदिर के अंदर जाते ही हम पहुँच जाते है महामण्डप पे जहाँ पे बने है अष्ट कमल रूफ पे जी दर्शाते है शक्ति ऊर्जा का प्रतीक और कमल तो है ही स्वच्छता का प्रतीक। 

चंद राजाओं की प्रतिमा ~ 
ज्योतिर्लिंग गर्भगृह मैं स्थापित है चंद राजाओं की प्रतिमा 
दीप चंद और पवन चंद , ये चंद वंश के अंतिम राजा थे जिन्होंने मंदिर व्यवस्थाएं की। और अपनी प्रतिमा भी स्थापित की और सौगंध खायी की जब तक सूरज चांद रहेगा यहाँ पे पूजा होती रहेगी । 

बटुक भैरव मंदिर ~ 
भैरव शिव के हो रूप है। जो सबसे भयानक रूप है। जो समय से परे है, जो काल है, जहाँ पे सब कुछ खत्म हो जाता है, तब जाकर मिलते है शिव। इसलिए भैरव के दर्शन करना और उनकी आराधना करना अति शुभ है। शिव स्थल गर्भ गृह एक पवित्र स्थान है। और वहाँ पे किसी भी तरह की negetive ऊर्जा का वास होना अच्छा नहीं है इसलिए महाकाल उस सब से बचाव के लिए बटुक भैरव है। 
 

Batuk Bhairav Mandir


कुबेर मंदिर ~ 
बाहर निकलते ही अलग थलक देवदार वृष्क्षों के बीच मैं बने है श्री कुबेर भगवान मूर्ति शिवलिंग रूप मैं । 
 

Kuber Temple

४ वेदियों से युक्त परम धाम श्मशान घाट ~ 
अति पवित्र स्वर्ग समान धन जहाँ पे साक्षात शिव दर्शन देते है, जटा गंगा के तट पे बना है ये पवित्र धाम। 

Shamshan Ghat


ब्रह्मा कुण्ड ~ 
सरयू गंगा के समान ही ब्रह्मकुंड का मान है, यही से ऋषि मुनि और यात्री गण जल ले जाकर शिव का अभिषेक करते है। 

Brahma Kund


मूर्ति संग्रहालय ~ 
मंदिरों के सातवी आठवी शताब्दी मैं बने सारे सुंदर नक्काशी की मूर्तियाँ यहाँ पे सभी लोगों के लिए रखी है। 
यहाँ पे पोंन राजा और नवग्रह पटल ज़रूर देखना चाहिए। 
 

जागेश्वर धाम की सुरक्षा के लिए चारों कोनू मैं भी एक रक्षा कवच की स्थापना की गई,~ 

  • पूरब मैं श्री कोटेश्वर कोटलिंग क्षेत्र 
  • पश्चिम मैं दंडेश्वर महादेव 
  • उत्तर मैं श्री वृद्जागेश्वर धाम, यहाँ पे भगवान शिव के निवास स्थान हिमालय पर्वत की सुंदर दृश्य से मन मोहित हो जाता है। 
  • दक्षिण मैं झकारशैम जहाँ पहले से भेंशों की बलि दी जाती थी। 

राम मंदिर और भीम के पैर ~
२ किमी का ट्रेक करने पर एक क्षेत्र आता है जिसे सभी लोग राम का मंदिर और भीम के पर बोलते है।

शौक़ीयथल विद्यालय/ सरस्वती मंदिर ~
सीताराम बाबा जी आश्रम ~ 
श्री श्री १००८ सीताराम बाबा जी की कुटिया है। देवी माँ सरस्वती जी का मंदिर है। और हनुमान जी का मंदिर है। सीताराम बाबा जी जहाँ पे भी निवास करते थे तो वो हनुमान मंदिर ज़रूर बनाते थे। 
वही पे बना है पूरे क्षेत्र का १२ वी तक का स्कूल । 


श्री वृद्धजागेश्वर धाम~ 
जागेश्वर से ३०mint ड्राइव करके श्री  वृद् जागेश्वर धाम आता है। जो अपनी हिमालयन व्यू के लिए अति प्रसिद्ध है। यहाँ से बद्रीनाथ केदारनाथ के दर्शन का लाभ मिलता है। बद्रीनाथ जी के दर्शन के लिए जो लोग बद्रीनाथ नहीं जा पाते है वो यही पे दर्शन करके भगवान को मालपुआ का भोग लगा देते है। इसलिय यहाँ पे। बागवान शिव को मालपुआ का भोग लगाया जाता है। 
यहाँ पे कुछ और मंदिर है जिनमें से प्रमुख है- 

  • हनुमान मंदिर 
  • देवी मंदिर 
  • कुबेर मंदिर 
  • भैरव मंदिर 
  • यज्ञ शाला
  • क्षेत्र पाल 

सीताराम बाबा की कुटिया~ 
वही se 1 किमी जंगल में बनी है सीताराम बाबा जी की कुटिया जहाँ पे बाबा जी ने कई साल तक तपस्या की, 

मिरतोला आश्रम~ 
पूरे क्षेत्र मैं श्री राधा कृष्ण का मंदिर यही पे है। १९२८ मैं बना ये आश्रम श्री यशोदा माई और श्री कृष्ण प्रेम जी ने बनाया। यहाँ पे भी जागेश्वर की ही तरह आरती भोगपूजा और सायं आरती का विधान है। 
जागेश्वर से लगभग ७km पे बना है श्री राधा कृष्ण का मंदिर। यह एक बहुत बड़ा आश्रम है ।जहाँ पे खेती बाड़ी,गोशाला और बहुत सुंदर श्री राधा कृष्ण जी के बाग बना है। 

एरावत गुफा ~ 
जागेश्वर से १km ट्रेक करके एक विशाल पथ्थर है जो बिल्कुल एक बिशाल हांथी ki तरह दिखता है। बहुत साधु संन्यांशी इन्ही जगहों मैं रहते है, 


जागेश्वर धाम का महोत्सव

वैसे तो यहाँ पे रोज़ ही मेला और उत्सव मनाए जाने का विधान भी है और मनाए भी जाते हैं। फिर कुछ विशेष माह है जैसे- 

सावन~
शिव स्थान होने से यहा तो रोज़ ही मेले जैसा महोल होता है लेकिन को पवित्र त्योहार है जैसे भगवान शिव को बहुत अच्छा लगता है सावन का महीना। पूरे महीने भर बारिश से शिव का रुद्राभिषेक होता  रहता है।  जो कि १५ जुलाई से १५ अगस्त तक रहता है। 

महाशिवरात्रि~
महाशिरात्रि भी बहुत ही सुंदर तरह से मनाई जाती है। रात के १२ बजे शिवमहा पूजा होती है। जिसमें भगवान शिव के १००८ नामो से शिव को पूजा जाता है । भक्त गण रात भर भजन कीर्तन से शिव के चरणो में लीन रहते है। 
जागेश्वर में हर महीने के प्रतिपदा को यानी हिंदी कैलेंडर के अनुसार पहली तारिक को दास जो कि लोकल folk ड्रम बजाके नए महीने कि सुरुआत करते है। और पूरे मंदिर की प्रदक्षिणा करते है। तो उस तरह से हर दिन हर महीना यहां त्योहार ही मनाया जाता है। 


घृत कमल पूजा~ 
शिव को १ माह के लिए घृत कमल गुफा में जाना है। प्रचलित कहानी के अनुसार अत्यधिक ठंडा होने के कारण भगवान को मानस भाव अनुसार घृत का एक लेयर लगा देते है जिससे उनको ठंडा कम लगे। उबलिये उनका इस पूजा का विशेष महत्व है। 


उतरायणी मेला~ 
बहुत ही सुंदर और मनमोहक होता है ये त्योहार भी ठंडा इतना की शरीर काम करना बंद कर दे लेकिन शिव जी की महिमा ऐसी की कुछ लगता ही नहीं, बहुत लोग दूर से आए है और अपने बच्चों का उपनयन संस्कार करते है। ब्रह्मकुंड में। 


होली ~ 
जागेश्वर जी होली ना देखी तो यात्रा अधूरी है। यहाँ पे सबसे पौराणिक तरह से मनायी जाती है होली । यहाँ पे होली को ६ या ७ दिनों के लिए मनायी जाती है पंचांग के अनुसार और पूरे क्षेत्र मैं उस ध्वजा को देवी का रूप या डोला बनाके घुमाया जाता है। सभी लोग पूजा अर्चना करते है। कुमाऊनी वाद्य यंत्रों से होली के सुंदर गानों से गूंज उठता है पूरा जागेश्वर । 

 

Exploring Jageshwar